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देवशयनी एकादशी : जानिए चातुर्मास में क्यों सो जाते हैं भगवान विष्णु ?

by Khabar7 - 20-Jul-2021 | 16:02:29
देवशयनी एकादशी : जानिए चातुर्मास में क्यों सो जाते हैं भगवान विष्णु ?

20 जुलाई 2021,

नई दिल्ली !!

आज देवशयनी एकादशी है। आज से चातुर्मास की शुरुआत हो जाती है। चातुर्मास को बरसात के महीनो के रूप में भी जाना जाता है। हिंदू धर्म में इसे तपस्या का मौसम भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी से विष्णु भगवान व अन्य सभी देवता विश्राम के लिए प्रस्थान कर जाते हैं देवताओं का यह विश्राम पूरे 4 माह तक रहता है इसीलिए इसे चतुर्मास कहा जाता है।

 चातुर्मास से भगवान विष्णु गहरी निद्रा में चले जाते हैं और चार महीने बाद देवोत्थान एकादशी के दिन निद्रा से उठते हैं। शास्‍त्रों के अनुसार, भगवान व‌िष्‍णु जब तक सोते हैं उतने दिनों तक कोई शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं। आइए जानते हैं कि, चातुर्मास में भगवान विष्णु आखिर क्यों सो जाते हैं और विष्णु भगवान के सोने का क्या रहस्य है।
 
ऐसा कहा जाता है कि, चातुर्मास में भगवान विष्णु 4 महीने तक सोते हैं। इस दौरान पूरी दुनिया का अधिकांश भाग बाढ़ के पानी से जलमग्न होता है। यह समय वार्षिक प्रलय का होता है जब दुनिया खुद को एक नए सिरे से तैयार करती है। ये प्रलय वर्ष के दूसरे भाग में यानी जुलाई से दिसंबर तक रहती है।

इस समय में सूरज देव दक्षिरायण हो जाते हैं। यानी सूर्य की स्थिति पृथ्वी के दक्षिण गोलार्ध की तरफ हो जाती है। इस समय सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करते है। कर्क राशि का राशि चिह्न 'केकड़ा' होता है। ऐसा कहा जाता है कि ये केकड़ा सूर्य की रोशनी खाना शुरू कर देता है, इसलिए इस अवधि में दिन छोटे होने लगते हैं।

प्रलय का समय - पुराणों के अनुसार, इस दौरान दुनिया में अंधकार और उदासी छा जाती है। इस उथल-पुथल को संभालने में विष्णु भगवान थक जाते हैं और विश्राम के लिए चार महीने की गहरी निद्रा में चले जाते हैं। इस अवधि में भगवान विष्णु अपना कार्यभार अपने विभिन्न अवतार को सौंप कर आराम करने जाते हैं।
 
पृथ्वी को उपजाऊ बनाने का समय - मान्याताओं के अनुसार, भगवान विष्णु आषाढ़ के शुक्ल पक्ष के 11वें दिन से कार्तिक के शुक्ल पक्ष के 11वें दिन तक सोते हैं  इस अवधि में पृथ्वी की उर्वरक क्षमता कम हो जाती है। जितने दिनों तक भगवान विष्णु निद्रा में रहते हैं, उनके अवतार सागर में संजीवनी बूटी बनाते हैं। इससे दुनिया फिर से उपजाऊ हो जाती है और इस समय में फिर से एक नया जीवन भरता है।
 
यात्रा में सावधानी - 

इस अवधि में यात्रा करने से बचने की सलाह दी जाती है। पुराणों के अनुसार, प्राचीनकाल में लगातार यात्रा करने वाले ऋषि-मुनि भी इन चार महीनों में कहीं नहीं आते-जाते थे। यह प्रचलन कई धर्मों में अभी भी है आपने सुना होगा कई जैन मुनि इन दिनों किसी शिष्य के यहां रुक कर प्रवास करते हैं और 4 महीने विश्राम के बाद ही वह आगे की यात्रा शुरू करते हैं। ये समय फसल का भी होता है, जब दुनिया फिर से हरी-भरी दिखने लगती है|
  
प्रार्थना और त्योहारों का समय - 

इस समय लोग तरह-तरह के त्योहार मनाते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं कि बारिश सही मात्रा में हो, ना ही कम और ना ही ज्यादा। आषाढ़ के इस मौसम के बाद सावन शुरू हो जाता है जिसमें लोग उपवास रखते हैं और पूरी श्रद्धा से भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं|
 
भाद्रपद की शुरूआत - 

सावन खत्म होते ही भाद्रपद की शुरूआत हो जाती है। भगवान विष्णु के निद्राकाल के दौरान यानी इन चार महीनों में तरह-तरह के त्योहार पड़ते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी, रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी जैसे त्योहार मनाने के बाद पितृ पक्ष की शुरूआत होती है। इसमें पूर्वजों का मान-सम्मान किया जाता है।

इसी समय पृथ्वी से तमाम असुरों का नाश किया गया था। इस अवधि में भगवान राम रावण का वध कर अयोध्या लौटे थे। जिसके उपलक्ष्य में दिवाली मनाई जाती है। इस दौरान मां लक्ष्मी को भी याद किया जाता है। ये त्योहार हमें याद दिलाते हैं कि, दुनिया से बुरा समय अब खत्म होने को है क्योंकि भगवान विष्णु के जागने का समय करीब आ रहा है।
  
भगवान विष्णु के शयन निद्रा से उठने का समय - 

ऐसी मान्यता है कि, दिवाली के समय माता लक्ष्मी का आगमन होता है और मां लक्ष्मी का आगमन होने पर भगवान विष्णु ने अपनी निंद्रा त्याग दी थी और वह जाग उठे थे। पौराणिक धार्मिक कथाओं के अनुसार यह मान्यता है कि 4 माह की निद्रा त्याग कर जागने के बाद ही भगवान विष्णु ने लक्ष्मी माता से विवाह किया था।

इसलिए इस दिन के बाद से विवाह जैसे मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं। और विष्णु भगवान कार्तिक माह की एकादशी से लेकर फिर 8 माह तक संसार को संभालने में भरण पोषण में लग जाते हैं और फिर पुनः आठ महा तक संसार को संभालते हैं यही चक्र धरती पर इस प्रकार चलता रहता है।

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